बंदूक से जिसने लिया था बदला, जिसके नाम से कांपा था बीहड़, कौन थी वो फूलन?

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नई दिल्‍ली ।

चंबल के बीहड़ों पर कभी फूलन देवी के खौफ का साया था। 1981 के बेहमई कांड के बाद फूलन देवी को मीडिया ने नया नाम ‘बैंडिट क्‍वीन’ दिया था। आज उसी बैंडिट क्‍वीन का जन्‍मदिन है। फूलन देवी का पूरा जीवन किसी त्रासदी की ही तरह रहा। बचपन में पहले परिवार और फिर पति के हाथों उसको यातना मिली। उसने अपने जीवन में काफी कुछ सहा। यहां तक की उसके पति ने उसके साथ काफी समय तक दुष्‍कर्म किया। इसके अलावा डाकुओं के गिरोह ने उसके साथ सामूहिक बलात्‍कार किया। फूलन का एक डाकू से एक सांसद बनने का सफर भी किसी हाईप्रोफाइल स्‍टोरी से कम नहीं है।

अभिशाप से कम नहीं था जीवन

फूलन देवी का जन्‍म 10 अगस्त 1963 को यूपी के जालौन में स्थित ‘घूरा का पुरवा’ में हुआ था। बचपन से ही गरीबी में रहने वाली फूलन पर उसका नीची जाति का होना किसी अभिशाप से कम नहीं था। लेकिन इन सभी के बावजूद वह किसी से न डरने वाली लड़की थी। बचपन में ही उसने जमीन हड़पने से नाराज होकर अपने चाचा के खिलाफ बगावती स्‍वर अपनाए थे। लेकिन इसके बाद उसकी शादी कर दी गई। यह शादी उसको सजा के तौर पर दी गई थी। सजा इसलिए भी थी क्‍योंकि जहां वह महज दस वर्ष की थी उसके पति की उम्र उससे कहीं ज्‍यादा थी

अधेड़ उम्र के पति ने कई बार की जबरदस्‍ती

उसके अधेड़ उम्र के पति ने उसके साथ शादी की पहली रात से जो दरिंदगी शुरू की वह उसके घर से निकलने के बाद खत्‍म हुई। इस दौरान उसको हर रोज अपने साथ हो रही जबरदस्‍ती को बर्दाश्‍त करना पड़ता था। इसके चलते उसकी सेहत काफी खराब हो गई, जिस वजह से उसको अपने मायके आना पड़। लेकिन इसके बाद उसके पति ने दूसरी शादी कर ली।

नए दोस्‍त बने, इनमें डाकू भी थे शामिल

अपने जीवन से परेशान फूलन के इस दौरान कुछ नए दोस्‍त बने, जिनमें कुछ डाकू थे। यह वह वक्‍त था जब फूलन को चाहने वालों में डाकूओं के सरदार बाबू गुज्जर और विक्रम मल्लाह भी शामिल थे। फूलन के चलते इन दोनों में तनातनी इस कदर बढ़ी की विक्रम ने मौका मिलते ही गुज्‍जर की हत्‍या कर दी और खुद गिरोह का सरदार बन बैठा। 

फूलन का अपहरण

फूलन की लाइफ में एक समय वो भी आया जब वह मल्‍लाह के साथ अपने पति के यहां गई और वहां पर उसने अपनी साैतन और पति की जमकर मार लगाई। इसी दौरान डाकुओं का एक और ठाकुर गिरोह जो बाबू गुज्‍जर की हत्‍या से नाराज था और उसकी हत्‍या की वजह वह फूलन को मानता था, ने उसके गिरोह के खिलाफ जंग का एलान कर दिया। इसके बाद दोनों गिरोह की कई बार आपसी मुठभेड़ हुईं। ऐसी ही एक मुठभेड़ के दौरान मल्‍लाह और फूलन किसी तरह से एक महफूज जगह पर पहुंच गए। इस दौरान इन दोनों के बीच संबंध भी बने। लेकिन तभी वहां पर दूसरे गिरोह ने हमला कर दिया और मल्‍लाह की मार कर फूलन का अपहरण कर लिया गया।

सामूहिक दुष्‍कर्म का शिकार हुई फूलन

फूलन के लिए यह समय बहुत बुरा था। इस गिरोह के सभी सदस्‍यों ने फूलन के साथ कई दिनों तक बारी-बारी से बलात्‍कार किया। उसको कई दिनों तक भूखे प्‍यासे और बिना कपड़ों के रखा गया और गांव में भी घुमाया गया। उससे बलात्‍कार करने वालों में कुछ गांव के लोग भी थे। जिस वक्‍त उसको यह बुरा दौर देखना पड़ा उस वक्‍त वह महज 18 वर्ष की थी। लेकिन वह किसी तरह से यहां से भागने में कामयाब हो गई और एक डाकुओं के गैंग में शामिल हो गई।

बेहमई हत्‍याकांड

1981 में फूलन बेहमई गांव लौटी। यहां पर उसने उन दो लोगों की पहचान की जो सामूहिक बलात्‍कार के दौरान शामिल थे। फूलन ने उनसे गिरोह के दूसरे सदस्‍यों के बारे में जानकारी ली लेकिन उनके कुछ न बताने पर फूलन ने इस गांव के करीब 22 लोगों को लाइन में खड़ा कर गोली मार दी थी। यह सभी लोग जाति से ठाकुर थे। बेहमई हत्‍याकांड कानूनी भाषा में सबसे जघनतम अपराध था। इस हत्‍याकांड की गूंज चारों तरफ सुनाई दी और फूलन की छवि एक खूंखार डकैत की बन गई थी। इस कांड की गूंज केंद्र से लेकर यूपी और एमपी के विधानसभा में भी सुनाई दी।

इंदिरा गांधी की पहल पर आत्‍मसमर्पण

इंदिरा गांधी की सरकार ने 1983 में उनसे समझौता किया जिसके तहत उसको मौत की सजा न देने और उनके परिवार के सदस्यों को कोई नुकसान न पहुंचाने का वादा किया गया था। इस समझौते के लिए भिंड के एसपी राजेंद्र चतुर्वेदी को लगाया गया था, जिसमें वह सफल भी हुए। इसके बाद फूलन ने मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने अपने कई साथियों के साथ सरेंडर कर दिया। फूलन पर 22 लोगों की हत्या, 30 डकैती और 18 अपहरण के आरोप थे। आरोपों की सुनवाई के दौरान उसको करीब 11 वर्षों तक जेल में रहना पड़ा।

मुलायम ने लिए सभी आरोप वापस

1993 में यूपी सरकार के मुखिया मुलायम सिंह की सरकार ने फूलन पर लगे सारे आरोप वापस ले लिए। इसके बाद उसको 1994 में जेल से छोड़ दिया गया। जिसके बाद फूलन ने उम्मेद सिंह से शादी भी की। फूलन ने अपनी रिहाई के बौद्ध धर्म में अपना धर्मातंरण किया। समाजवादी पार्टी के करीब आने के बाद से फूलन का राजनीतिक करियर भी शुरू हुआ। 1996 में फूलन देवी ने समाजवादी पार्टी से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीती। 1998 में उन्‍हें हार का भी सामना करना पड़ा। लेकिन 1999 में वहां से एक बार फिर जीतने में कामयाब रहीं। 25 जुलाई 2001 को शेर सिंह राणा ने उनकी गोली मारकर हत्‍या कर दी। हत्‍या करने से पहले राणा ने उनके हाथ से खीर भी खाई। राणा ने अपनी गिरफ्तारी के बाद कहा कि उसने ऐसा कर बेहमई कांड का बदला लिया है।

फूलन का हत्‍यारे को उम्र कैद

लगभग तीन साल बाद 17 फरवरी 2004 को राणा फिल्मी अंदाज में तिहाड़ जेल से फरार हो गया। तिहाड़ जैसी अतिसुरक्षित जेल से किसी कैदी का फरार हो जाना अपने आप में बड़ी बात थी। इसलिए राणा एकाएक फिर सुर्खियों में आ गया। लेकिन 17 मई 2006 को राणा को एक बार फिर कोलकाता के एक गेस्ट हाउस से गिरफ्तार कर लिया गया। 14 अगस्त 2014 को दिल्ली की अदालत ने शेर सिंह राणा को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। 1994 में शेखर कपूर ने फूलन पर आधारित एक फिल्म बैंडिट क्वीन बनाई जो काफी चर्चित और विवादित रही। फूलन ने इस फिल्म पर बहुत सारी आपत्तियां दर्ज कराईं और भारत सरकार द्वारा भारत में इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गयी।

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