संजीव मिश्रा:जिले की जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज(मायागंज) अस्पताल की अव्यवस्थाओं की कीमत एक मासूम को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। ये है भागलपुर स्मार्टसिटी की दास्तान…

बांका से आई मस्तिष्क ज्वर की एक गंभीर बच्ची नेहा को डॉक्टरों ने देखा। उसे पीडियाट्रिक वार्ड में भर्ती करवाया। डॉ. अदिति ने परिजनों को खून जांच करवाने के लिए कहा।

परिजन मासूम को गोद में लेकर भटकते रहे। डॉक्टर की बात न समझ सके परिजन खून जांच करवाने की बजाय ब्लड लाने के लिए ब्लड बैंक की दौड़ लगाई। वे वार्ड और ब्लड बैंक के बीच चक्कर लगाते रहे, लेकिन नर्सों ने उन्हें समझाने की भी कोशिश नहीं की। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि ब्लड चढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि बच्ची की खून की जांच होनी है। नतीजा, अस्पताल परिसर में करीब पौन घंटे की दौड़ के बीच मासूम ने दम तोड़ दिया।

मामले में एचओडी डॉ. आरके सिन्हा का कहना है कि

मरीज को खून जांच लिखा था। लेकिन मरीज को लेकर परिजन भाग गए।

तीन साल की बेटी के मस्तिष्क ज्वर का इलाज कराने आए परिजन कुचक्र में फंसे
मायागंज अस्पताल में तार-तार हो चुके सिस्टम ने मानवता को शर्मसार कर दिया। डॉक्टर-नर्स की लापरवाही ने बेटी के जीवन की आस में आए परिजनों से उसकी बच्ची छीन ली। फफकती मां की गोद उजड़ी तो दादी के पैरों की जमीन खिसक गई। दोनों बदहवास हो गए।
बांका के पतरा गांव के रूदल दास की तीन साल की बेटी नेहा कुमारी मस्तिष्क ज्वर से पीड़ित थी।

उसकी नाक से खून बह रहा था। मां पिंकी और दादी सुनैना देवी के साथ पिता रूदल अस्पताल पहुंचे। दोपहर 12 बजे उसे पीडियाट्रिक वार्ड में भर्ती करवाया गया। डॉ. अदिति ने उसे देखा और खून की जांच करवाने को लिखा। रूदल नहीं समझ सका और खून लाने के लिए ब्लड बैंक दौड़ पड़ा। गोद में लिए बच्ची को लेकर दौड़ते रहे, ब्लड नहीं मिला।

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