ईपीएस पेंशन में बढ़ोतरी के मसले पर ऊहापोह में श्रम मंत्रालय

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नई दिल्ली ।

कर्मचारी भविष्य निधि की पेंशन स्कीम के तहत अधिक पेंशन के लिए कर्मचारियों के योगदान के अनुरोध का मामला वित्त मंत्रालय पहुंच गया है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद रिटायर्ड कमचारी और मौजूदा कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद ज्यादा पेंशन पाने के लिए अपने वेतन से पेंशन में अंशदान के लिए आवेदन कर रहे हैं। ऐसे आवेदनों की बाढ़ सी आ गई है। श्रम मंत्रालय की भी समझ में नहीं आ रहा कि क्या किया जाए, क्योंकि यदि इन्हें स्वीकार किया जाता है तो ईपीएफ कोष गड़बड़ा जाएगा। स्थिति की नजाकत को देख मंत्रालय ने गेंद वित्त मंत्रालय के पाले में डाल दी है। यही नहीं, प्रधानमंत्री कार्यालय को भी इससे अवगत करा दिया गया है।

ईपीएस के कुछ पेंशनरों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर अनुरोध किया था कि उन्हें ईपीएफ के अलावा ईपीएस में भी मनमाफिक योगदान की छूट दी जाए, ताकि वे अधिक पेंशन प्राप्त कर सकें। पिछले साल अक्टूबर में दिए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पेंशनरों के पक्ष में फैसला सुनाया था और पिछले वर्षों के सेवाकाल के लिए एकमुश्त अतिरिक्त योगदान लेकर पेंशनरों को ज्यादा पेंशन देने का ईपीएफओ को आदेश दिया था। तबसे कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) को ईपीएस में योगदान के अनुरोध प्राप्त हो रहे हैं।

ईपीएफओ ने इस मामले में स्पष्टीकरण के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की भी तैयारी शुरू कर दी है। वह विभिन्न हाईकोर्ट में चल रहे इसी तरह के मामले सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करवाने का भी प्रयास करेगा। इस संबंध में उसने आंतरिक सर्कुलर जारी किया है, जिसमें इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने का इरादा जताया गया है।

इस बीच ट्रेड यूनियनों ने भी ईपीएस के तहत न्यूनतम पेंशन को एक हजार रुपये से बढ़ाकर 3000 या 5000 रुपये करने के लिए सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। इस तरह सरकार के समक्ष दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। एक तरफ उसे ये देखना है कि स्कीम के तहत अधिक योगदान देने के इच्छुक पेंशनरों को अधिक पेंशन कैसे दी जाए तो दूसरी तरफ न्यूनतम पेंशन को किस तरह बढ़ाया जाए। दोनो ही मामलों में सरकार के ऊपर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा। इसे देखते हुए श्रम मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय व पीएमओ से हस्तक्षेप का अनुरोध किया है। यदि सुप्रीम कोर्ट सभी कर्मचारियों को इसका लाभ देने का आदेश देते है तो सरकार को ईपीएस स्कीम में संशोधन करना पड़ सकता है।

अभी ईपीएस में कर्मचारियों से कोई योगदान नहीं लिया जाता है। केवल नियोक्ता और सरकार योगदान करती है। पीएफ में नियोक्ता के 12 फीसद योगदान में से 8.33 फीसद ईपीएस में जाता है, जबकि 1.16 फीसद योगदान सरकार करती है। इस तरह हर महीने कर्मचारी के वेतन (मूल वेतन व महंगाई भत्ता) का 9.49 फीसद ईपीएस में जाता है। योगदान के लिए वेतन की सीमा है। वेतन कितना भी हो, नियोक्ता व सरकार केवल अधिकतम 15,000 रुपये पर ही योगदान देते हैं। कर्मचारी से ईपीएस में कोई योगदान नहीं लिया जाता होता। लेकिन यदि वे चाहें तो पीएफ में अपना योगदान बढ़वा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने पेंशनरों के साथ ईपीएस में मौजूदा कर्मचारियों के योगदान के लिए दरवाजा खोलने और पीएफ की तरह उसमें भी मनचाही बढ़ोतरी की सुविधा देने को कहा है। इससे उनकी पेंशन तो बढ़ जाएगी, मगर ईपीएफ कोष को संभालना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि पेंशन और भविष्य निधि का प्रबंधन अलग-अलग ढंग से होता है। पेंशन कोष में अतिरिक्त योगदान के लिए पीएफ कोष से राशि निकालनी पड़ेगी। इससे ईपीएफ कोष का प्रबंधन गड़बड़ा जाएगा।

ऐसी ही अड़चन न्यूनतम पेंशन बढ़ाने को लेकर आ रही है। अभी न्यूनतम 1000 रुपये पेंशन देने में ही सरकार पर 800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। यदि न्यूनतम पेंशन को 2000 रुपये किया जाता है तो यह बोझ बढ़कर 3200 करोड़ रुपये हो जाएगा।

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